Untold Story of Syed Zainul Abideen: कौन थे सैय्यद जैनुल आबिदीन जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सर सैयद को समर्पित कर दी और सर सैयद को सर सैयद बनाया।

 

Untold Story of Syed Zainul Abideen, aclose companion of sir Syed Ahmad Khan.

                     AMU, Jama Masjid


                            Taar Bangla


Strachey Hall

    JUNE 14, 2024 FRIDAY।          
   National Hussaini 72 News। 

अलीगढ़:  मौलवी सैयद जैनुल आबिदीन का जन्म 14 जून, 1832 को मछली शहर, जौनपुर, उत्तर प्रदेश में एक सैय्यद फैमिली में हुआ था। उनके पिता का नाम मौहम्मद हुसैन था। वे सर सैयद अहमद खान के बहुत करीबी सहयोगी थे। सैयद जैनुल आबिदीन सर सैयद के सबसे सच्चे और समर्पित मित्रों में से एक थे और व्यक्तिगत रूप से उनके बहुत करीब थे। सर सैयद उनसे बहुत प्यार करते थे और उन पर गर्व करते थे और उन्हें "ज़ैनू भैया" कहकर पुकारते थे। सर सैयद हाउस के दरवाज़े हमेशा उनके लिए खुले रहते थे और वे अक्सर सर सैयद हाउस में उनके साथ चाय और खाना खाते थे और सुबह की सैर पर उनके साथ जाते थे।
 सैयद जैनुल आबिदीन को 1872 में मोहम्मदन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज फंड कमेटी का सदस्य नियुक्त किया गया। उन्होंने स्ट्रेची हॉल (Strachey Hall) और सालारजंग डाइनिंग हॉल के निर्माण के लिए दान दिया। 1889 में उन्हें कॉलेज के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज का सदस्य नियुक्त किया गया। 1885 में वे गाजीपुर से सब-जज के पद से सेवानिवृत्त हुए। सर सैयद के अकाउंटेंट द्वारा गबन की घटना के बाद उन्होंने 1000 रुपये का दान भी दिया। सैयद जैनुल आबिदीन अपने सेवा काल में गाजीपुर, बनारस, मिर्जापुर, शाहजहांपुर, बरेली और मुरादाबाद में तैनात रहे। 1885 में सब-जज के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने 3 साल तक रामपुर में एक उच्च पद पर काम किया। 

सैयद जैनुल आबिदीन ने सर सैयद अहमद खान के मिशन का दिल से समर्थन किया। सर सैयद की पहल पर उन्होंने मछलीशहर की अपनी पुश्तैनी संपत्ति बेचकर "तार बंगले" में एक मकान बनवाया और कुछ रकम सर सैय्यद के मिशन में खर्च कर दी। उन्होंने 1897 में ये तार बंगला भी मौहम्मदन एंग्लो ओरियंटल कालिज (MAO) को दान कर दिया। 

सर सैयद की मृत्यु के बाद उन्होंने सर सैयद मजार के निर्माण में विशेष रुचि ली और इसके निर्माण के दौरान पूरा दिन चिलचिलाती धूप में छतरी के नीचे गुजारा। उन्होंने यूनिवर्सिटी जामा मस्जिद के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सैयद जैनुल आबिदीन की मृत्यु 27 सितंबर, 1905 को हुई और उन्हें यूनिवर्सिटी मस्जिद में सर सैयद की कब्र के पास ही सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनकी मृत्यु के बाद तार बंगला से गुजरने वाली सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया।


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