EID E GHADEER: लफ्जे मौला के मानी चाहे जो मान लीजिए लेकिन हज़रत अली को वैसा ही मानिए जैसा रसूल सअ का हुक्म है।

 


         कमर अब्बास सिरसीवी (समाजसेवी)


      JUNE 26, 2024 WEDNESDAY       
      National Hussaini 72 News        

सिरसी: अल्लाह की किताब और इस्लाम के क़ानून की बुनियाद, रसूल ए इस्लाम स० की सदाक़त के सिलसिले में उम्मत के यक़ीन पर क़ायम है क्योंकि उनके बताये गये लफ्जों को ही क़ुरान तस्लीम किया गया और उनके तर्ज़ ए हयात को ही इस्लाम का क़ानून माना गया। उनकी इताअत करते हुए ही अल्लाह की तौहीद का इक़रार किया जाता है और उन्हें अल्लाह का रसूल तस्लीम करते हुए ही उनके हुक़्म को हुक़्म ए ख़ुदा माना जाता है।

ख़ुदा के इन्हीं रसूल स० ने अपनी उम्मत के सामने हज के अरकान अदा करने के इलाही हुक़्म को अमली जामा पहनाते हुए सन् 10 हिजरी में अपनी ज़िंदगी का पहला और आख़िरी हज़ किया जिसके दौरान मैदान ए अराफात में वो शानदार ख़ुत्बा दिया जिसमें इस्लाम की तमाम तालिमात का निचोड़ शामिल था। इसके बाद हज के बाक़ी अरकान अदा कर अहले मक्का और ख़ाना ए ख़ुदा को विदा कहा और जब आपका क़ाफ़िला ग़दीर ए ख़ुम नाम के मक़ाम पर पहुंचा तो वो ज़िल्हिज्जा की 18 तारीख़ थी और इस जगह से मदीना, मिस्र और इराक़ के लिए अलग अलग रास्ते जाते थे इसलिए यहाँ तक रसूल स० के साथ आये तक़रीबन एक लाख से ज़्यादा हाजियों और सहाबियों को अपने अपने वतन के लिए अलग अलग रास्ते इख़्तियार करने थे। ऐसे अहम मक़ाम पर रसूल स० ने सबको एक जगह इकठ्ठा करने का हुक़्म दिया यहाँ तक की कुछ आगे जा चुके हाजियों को वापस बुलाया गया और पीछे रह गये हाजियों का इंतज़ार किया गया। सबको इकट्ठा करने के बाद ऊंटों के कजावों को मिलाकर मिम्बर बनाया गया और रसूल स० ने अल्लाह की तारीफ में तवील ख़ुत्बा देने के बाद वहाँ मौजूद सारे हाजियों से अपनी हैसियत और इख़्तियार को तस्लीम कराकर उसी मिम्बर पर खड़े होकर हज़रत अली को अपने हाथों से बुलन्द किया और फरमाया
*जिसका मैं मौला उसका अली मौला*। जिसके बाद तमाम हाजियों ने हज़रत अली को मुबारकबाद पेश की और ये सिलसिला तीन दिन तक चला। इसी वाक़ये को ग़दीर ए ख़ुम के नाम से याद किया जाता है और तमाम मुस्तनद किताबों में इसे दर्ज किया गया है।

जिस तरह इस्लाम के अलग अलग फिरक़ों में बहुत से हुक़्म ए ख़ुदा और हदीस ए रसूल स० की तफसीरों में इख़्तलाफ़ है उसी तरह का इख़्तलाफ़ इस वाक़ये के बारे में भी देखने को मिलता है और उस इख़्तलाफ़ की बुनियाद बनाया जाता है लफ्ज़ 'मौला' के मानी को। मौला के मानी बताये जाते हैं- दोस्त, मददगार, प्यारा, हाकिम वग़ैरह वगैरह। 

आईये इस लफ्ज़ मौला के मानी को जानने से पहले इस ख़ुत्बे की जगह, ज़रुरत और पसमंज़र पर ग़ौर करें। जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि हज के दौरान रसूल स० ने तमाम हज करने वालों के सामने मैदान ए अराफात में ख़ुदा के हुक़्म और इस्लामी तालिमात के बारे में एक तवील और शानदार ख़ुत्बा दिया था तो उसके तक़रीबन 10 दिन बाद तपते रेगिस्तान में हाजियों को फिर इकठ्ठा कर ऊंटों के कजावों का मिम्बर बनाकर अपनी हैसियत और इख़्तियार का इक़रार लेने के बाद किसी एक शख़्स को बुलंद करके किसी भी मानी में अपने जैसा कह देना कोई आम बात नहीं हो सकती है और उस ऐलान के बाद बड़े बड़े सहाबियों और हाजियों का उस शख़्स को मुबारकबाद पेश करना भी किसी ख़ास अहमियत की तरह इशारा करता है। मुबारकबाद के इस सिलसिले का तीन दिन तक चलना भी कुछ ख़ास इशारे करता है।
हमारा मक़सद किसी को सही या किसी दूसरे को ग़लत ठहराना नहीं होना चाहिए लेकिन ग़ैरजानिबदारी से काम लेते हुए ये ज़रूर सोचना चाहिए कि ऐसे माहौल और पसमंज़र में रसूल स० की ज़बान से निकला हुआ हुक़्म कोई ख़ास अहमियत रखता है । इसकी अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है कि इस हुक़्म के चंद महीने बाद रसूल स० इस दुनिया ए फानी को विदा कहने वाले थे।
हमारे ईमान और आमाल का हिसाब, रसूल स० की इताअत पर ही तौला जाना है इसलिए लफ्ज़ मौला के मानी चाहे जो मान लीजिए लेकिन हज़रत अली को वैसा ही मानिये जैसा रसूल स० का हुक़्म है। इस्लाम शख़्सियत परस्ती का हुक़्म नहीं देता है लेकिन रुहानी शख़्सियात की इताअत का हुक़्म देता है इसलिए ग़दीर ए ख़ुम का वाक़या हज़रत अली की इताअत से ज़्यादा रसूल स० की इताअत का मसअला है जिनकी इताअत ही ऐन ईमान है। लफ्ज़ मौला के जो मानी अच्छे लगें वो मानिये लेकिन हज़रत अली की हैसियत को वैसे ही मानिये जैसी इताअत ए रसूल स० में वहाँ मौजूद सहाबियों और हाजियों ने मानकर हज़रत अली को मुबारकबाद पेश की थी।
*इताअत ए रसूल स० में आप सबको यौम ए ग़दीर मुबारक*

कमर अब्बास सिरसीवी

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